करते हैं सब गरीबी मिटाने की बातेँ 

किसी की बात मुझे सच्ची नहीं लगती,


जो बनाई बाप ने सालों मेहनत से

मुझे वो टपकती छत कच्ची नहीं लगती,


ठोकरें खा रही मजबूरी मे जो कोठों पर

क्या किसी को उनमे अपनी बच्ची नहीं लगती


By - अंकित पंघाल


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