हकीकत यही है की अपराध
मेरा कहाँ था,
जो टुट गया वो सपना
मेरा कहाँ था,
मेरी जीत में तो तू शामिल थी हर पल
तेरी जीत का तो
जिक्र ही कहाँ था!
बड़ मुश्किल है हसरतों का मरना
बिना ईद के चाँद का निकलना
पर हो सके तो
अपना आसमां बुनना
अपनी उड़ानको नए आयाम देना!
के गर कहीं रुक भी जाए
ये सांस मेरी
या अहसास हो कुछ ऐसा
की जीत गया हूँ मैं ये बात भी मेरी
तू रोक देना मुझे
चलने से पहले
मेरे फिर से मेरा सपना बुनने से पहले
शायद मैं हार गया ये जीत मेरी
अब चाँद भी तेरा और ईद भी तेरी!


