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मेरे वाली.......

मेरे वाली.......



वो कभी मेरे वाली कहलाती थी।


चंचल चित था उसका,

हिरनी सी चल आती थी।

आँखे नीली गंगा जैसी,

मुझे देख देख मुस्काती थी।

वो कभी मेरे वाली कहलाती थी।


सब सखी संग चलती,

पर वो अलग दिख जाती थी।

जैसे काली रातो को हटा,

चाँद की चांदनी आती थी।

वो कभी मेरे वाली कहलाती थी।


नजरो का खेल था ऐसा।

सब नजरो से कहे जाती थी।

छन भर दूर हुआ उससे,

तो वो अस्क बहुत बहाती थी।

वो कभी मेरे वाली कहलाती थी।


जब दिल करता मिलने का,

चुपके से पर्ची छोड़ वो जाती थी।

फूल बगीचे बीच बैठ,

बाल मेरे सहलाती थी।

वो कभी मेरे वाली कहलाती थी।


पुरे दिन वो बाते करना,

छोड़ काम मुलाकाते करना।

चुपके चुपके छत पर आती थी,

चाँद में मुझको देख शर्माती थी

वो कभी मेरे वाली कहलाती थी।


उसकी गलिया भी दोस्त थी मेरी,

चुपके से सब उसको बताती थी।

जैसे ही दुआर मैं उसके आता वो,

आ आंगन में कँगन खनकाती थी 

वो कभी मेरे वाली

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