दर्पण....


में दर्पण ऐसा चाहाता हु।।

जो छवि चित्र को छोड़।।

बस प्रेम भाव को दिखलाये।

कुछ मै उसमे नजर आऊ।।

कुछ वो मुझमें नजर आये।


में दर्पण ऐसा चाहाता हु।।

जो छल पकट को दिखलाये।।

कितनी कालिख उसने है।

कितनी कालिख मुझमे है।

हम दोनों को ही बतलाये।।


में दर्पण ऐसा चाहाता हु।

जो सदैव सच ही बतलाये।

चोरो को वो चोर कहे।

और सच्ची बात बता पाये।


में दर्पण ऐसा चाहाता हु।।

जो तप बल की शक्ति हो।

मीरा जैसा प्रेम करे।

बजरंगी जैसी भग्ति हो।


में दर्पण ऐसा चाहाता हु।।

जो सपनो में ऊर्जा भरे।

फिर सारे लोक घुमु मै।

हर शखर को चुमु मै।


में दर्पण ऐसा चाहाता हु।।

जो बचपन को दिखला दे।

फिर मस्त मग्न हो झुमू मै।

हाँ नग्न शरीर घुमु मै।


में दर्पण ऐसा चाहाता हु।

जो भगत सिंह से मिलवा दे।

फिर चरणों को उनके चुमू में।

बन मतवाला उस जैसा घुमू में।


में दर्पण ऐसा चाहाता हु।।

जो नेताओ से बचा सके।

अस्ल रूप उनके दिखा सके।

इस लोकतंत्र को सजा सके।


में दर्पण ऐसा चाहाता हु।।

जो मृत्यु से मिला सके।

पल पल ही तो मरता हु।

हर भय को मुझसे मिटा सके।


में दर्पण ऐसा चाहाता हु।।

जो जीवन दर्शन करा सके।

कुछ धन नहीं है जीवन।

लोगो को बता सके।


में दर्पण ऐसा चाहाता हु।।

जो माँ बाप को समर्पित हो।

भगवान मान सेवा करे।

जीवन में दुःख ना अंकित हो।


में दर्पण ऐसा चाहाता हु।।

जो ईश्वर से मिला सके।

थोड़ा मेरा उद्धार हो।

उस दर्पण का उपकार हो।


में दर्पण ऐसा चाहाता हु।।

जो शुद्ध हवा और जल देदे।

पियासो पर उपकार हो।

फिर ना कोई बीमार हो।


में दर्पण ऐसा चाहाता हु।।

जो आंसू को मिटा सकते।

बाप ना ले बेटे की अर्थी।

कोई बच्ची ना हवस की शिकार बने।


में दर्पण ऐसा चाहाता हु।।

जो मधुशाला में टिक जाएं।

मदिरा पिए बैठे है जो।

जीवन उनको समँझ आये।


में दर्पण ऐसा चाहाता हु।।

जो कर्ण की गाथा सुना सके।

उस जैसा ना बन सकते हम।

पर हममे दान वीरता जगा सके।


में दर्पण ऐसा चाहाता हु।।

ऐ हरी मेरी पुकार सुनो।

बन दर्पण तुमको खुद आना है।

इस धरा का कष्ट मिटाना है।।


# अंकित लंदन तोड़