क्यो आखिर जमाने से डरना जरूरी है

मुझे लगता है सबको खुद की तरह ही बनना जरूरी है,


ईश्क़ करो जिंदगी में जरूर एक बार

पर जब वफ़ा न मिले तो सम्भलना जरूरी है,


वैसे तो महबूब से कोई शिकायत नही है मुझे

पर उसे कोई कह दो उसका सजना- सँवरना जरूरी है,


हूँ कैद खुद में अरसे से, पींजरे में परिंदे की तरह

अब तो बस लगता है कि निकलना जरूरी है,


था मिला मुझे भी राहगीर की तरह एक शख्स

बता रहा था ज़माने की तरह खुद को बदलना जरूरी है,


मैं सोचता हूँ कभी- कभी, क्या मुसीबत होगी उसपर

जिसको अंदाजा ही नही कि उसे एक दिन मरना जरूरी है।

                    - अंकित कन्नौजिया