वो एक पेड़ सीधा लम्बा सा
क़ई चींटो पक्षियों का घर था वो
पर मेरे मन कि लालसा,
उसी पेड़ पर जलेबीनूमा एक फल,
हम उसे जंगलजलेबि कहते थे,
जब वो पकजाती तो
स्वाद कुछ हल्का मीठा सा हो जाता,
लकड़ी का एक खरंजा बना दूर दूर कि जंगलजलेबि भी तोड़ लेते थे हम,
पर इस पेड़ से जंगलजलेबि तोड़ना आसान ना था,
बचपन का मन और एक उत्सुकता
आषाड़ कि गर्मि कि सुबह मैं उस पेड़ पर चढ़ गया,
डर डर कर,
शायद् दो ही जंगलजलेबि तोड़ी थी कि
चींटों ने हमला कर दिया
एक साथ सात,
जैसे तैसे उस लम्बे से पेड़ से उतरा
सात जगह काटा
फिर कभी उस पेड़ के पास नहीं गुज़रा,
एक समय सा बीता है
आज फिर वही पेड़ वही दोपहरी सामने है,
सोच रहा हुँ फिर एक बार कोशिश की जाये।