ग़ज़ल


तेरे हक़ में अब भी दुआ कर रहा हूँ,

रिवाज-ए-मुहब्बत अदा कर रहा हूँ।


खुदा माफ़ करना तेरे दर न आया,

उसे इश्क़ में अब खुदा कर रहा हूँ।


तुम्हारे छुअन की महक हाथ मे हैं,

तुम्हे हाथ की मैं हिना कर रहा हूँ।


ज़ुबाँ चुप रहे तो इशारे समझना,

निगाहों को मैं आईना कर रहा हूँ।


वही एक क्यूँ याद सारे जहाँ में,

उसी के लिए क्यूँ दुआ कर रहा हूँ।


मेरी याद से अब चला जा कहीं ‘औ’र,

तुझे क़ैद से मैं रिहा कर रहा हूँ।


वही दर्द था वो जो तेरी इनायत,

मैं उस दर्द को काफ़िला कर रहा हूँ।


-योगेश राठौर-यश-