वो परिंदों को दाना खिला के गया,

यानी की जाल फिर से बिछा के गया।


आँधियों में भी लड़-लड़ के जलता रहा

वो दिया कोई दिलबर बुझा के गया।


फ़ैसला वो जुदाई का पहले से कर,

आख़री बार रिश्ता निभा के गया।


घर में यूँही तो आई नहीं है नमी,

अब्र शब-भर दिवारें भिग़ा के गया।


पूछता है वही हाल मुझसे मेरा,

ज़ख़्म पे जो नमक भी लगा के गया।


ग़ैर की बाँह में वो लगा खुश बहुत,

जो असर था मेरा सब भुला के गया।


तुम मुझे मैक़दे में ही पाओगे अब

मैं हूँ बैठा जहाँ वो बिठा के गया।


लौट आने का उसका इरादा नहीं,

इश्क़ औ दर्द सब आज़मा के गया।


-योगेश राठौर-“यश”