दूर निकल आया हूँ...
कुछ पन्ने जो निकल गये हैं किताब से,
उनकी जगह ख़ाली छोड़ आया हूँ,
ज़िंदगी की भरी किताब के कुछ हसीन पन्ने छोड़, में दूर निकल आया हूँ
जिस घर में कभी जन्म लिया था,
माँ की गोद में रोना, हँसना, बोलना शुरू किया था,
जहाँ पा ने उँगली पकड़ चलना सिखाया था,
माँ की डाँट ओर प्यार में जहाँ जीना शुरू किया था, वो दुनियाँ मैं दूर छोड़ आया हूँ,
आज दूर निकल आया हूँ... कुछ पन्ने जो निकल गये हैं किताब से,
उनकी जगह ख़ाली छोड़ आया हूँ...
कुछ साल नहीं, कुछ दशक का रिश्ता मैं तोड़ आया हूँ,
जिन्हें साँसों की ख़बर होती थी, उनसे ख़ून का रिश्ता तोड़ आया हूँ,
छोटी बहन का स्नेह ओर बड़े भाई का प्यार, कुछ चित्रों में क़ैद कर लाया हूँ,
कुछ पुरानी रंग की दीवारों को छोड़, नई दीवारों को रंगने आया हूँ.
आज दूर निकल आया हूँ... कुछ पन्ने जो निकल गये हैं किताब से,
उनकी जगह ख़ाली छोड़ आया हूँ...
बरगद के पेड़ की छायाँ से मुँह मोड़ के आया हूँ,
उसके टूटे पत्तों की तरह हवा से उड़ कर दूर निकल आया हूँ,
एक नई उमीद, नई दिशा, नया साहस भर के आया हूँ,
नये सपनों को अपना बना के कहीं दूर निकल आया हूँ.
कुछ पन्ने जो निकल गये हैं किताब से,
उनकी जगह ख़ाली छोड़ आया हूँ...ज़िंदगी की भरी किताब के कुछ हसीन पन्ने छोड़, में दूर निकल आया हूँ...!