हर तरफ़ धुआँ है क्यूँ, आस्माँ झुक गया है क्या,
ये कैसा शोर है बादलों में, क्यूँ ये दिन ढल गया,
आँख है भरी भरी, हवा में रेत पिघल रही,
रोड़ हैं जो रात के, बर्फ़ की चादर ओड़ के खड़े.
हवा नहीं है कहीं, सूरज की नहीं रही ज़मीं,
ये कैसा शोर है मचा, सारा जग जल रहा,
क्यूँ धड़कने हैं रुकी रुकी, आदमी जानवर बन रहा,
कौन सेफ़ हैं यहाँ, किस की है ज़मीं किस का आस्माँ,
सब है यहाँ किराए का, रूह जिस्म पराए का,
तू किस होड़ में लगा, सारा जग है जल रहा,
अभी नहीं रुका अगर, ये साँस थम जाएगी,
साँसों की होड़ में ये रूह भी बिक जायेगी,
ख़बर नहीं तुझे अभी, हर तरफ़ धुँधला सा शोर है,
बिक रही है हवा बिक रहा है जल,यहाँ,
रूह का मेहमान तू रूह का है आसरा,
एक दिन बिकेगी ये भी सारा जग खाँस रहा.
by Yogesh rathor (www.ankheboltihai.com)