आज फिर मेरी मौत का सामान ले आए तुम, पार्थिव शरीर को जलाने मेरी जान ले आए तुम। उसे देख आज फिर दिल लगी जागी है मुझमें, उठ तो जाऊँ पर दाग़ गहरे सरेआम ले आए तुम। जो बहा रहे हैं पानी इनसे आग बुझेगी ना प्यास, आख़िरी तमाशा है फिर भी दग़ाबाज़ ले आए तुम। तुम तो ख़ैर मना सकते थे मेरी मरज़ूल-मौत का, मेरे मरने के बाद भी शिकारी साथ ले आए तुम। तुम ज़िंदा हो तुम पिघल सकते हो जज़्बातों से, मैं वाक़िफ़ हुँ फिर वही आख़िरी रात ले आए तुम।