मैंने एक दशक उस खुदा की तालाश में गुज़ारा, कभी भटका मंदिर-मस्जिद तो कभी गिरजे गुरुद्वारा, रवायतों की सभी दीवारें बस ढोंग से रच रहे थे, धर्म की आड़ में सभी धर्म, इंसानियत के भ्रम में बिक रहे थे।