बचपन की उछल कूद ओर भोली नादानियाँ, याद है मुझे अभी चोरी छुपे की हुई शेतानियाँ, सुबह सुबह बेट बोल ले निकल जाते थे घर से, फिर दौड़ते आते करते स्कूल जाने की तैयारियाँ, बढ़ई लकड़ी को तराश कर रोज़ अच्छे से सँवारता, याद मुझे निहारना रास्ते भर की रंग-बिरंगी दुनियाँ, मोर पंख किताब में रखकर पास होने की उपासना, गणित का टीचर खड़ूस बनाना चाहता था बानियाँ, कभी आधे तो कभी पूरे में पाते स्कूल से आज़ादी, किराये पर 50 पैसे की साइकल से बनाती निशानियाँ, 7 बजते ही दिल्ली ने काला दिवस धूमधाम से मनाया, बच्चों की टोली ने भी लुका-छुपी का कोहराम सुनाया, सुबह से कब रात हुई बचपन जाने कब बड़ा हो गया, कल का शैतान आज समझदारों की बीच खड़ा हो गया।