रोपता है रोटियाँ वो, सींचता दिन- रात है।

फिक्र क्या— फिर पक्ष या विपक्ष में हालात है? 

अपनी सत्ता का वो रक्षक बन के उठ जाता है जब,

टिक न पाता सामने, फिर कोई झंझावात है।

ऐसे जीवट का भी कुछ गुणगान होना चाहिए।

अन्नदाता का धरा पर मान होना चाहिए।

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है अनोखी बात कुछ बंदे के कारोबार में।

भूख लेकर बांटता है रोटियाँ संसार में।

हाय! ये निर्बोधता , बेचारगी की इंतिहा।

रह गया निर्बल-निरर्थक —आज भी व्यापार में।

आदमियत का भी एक ईमान होना चाहिए।

अन्नदाता का धरा पर मान होना चाहिए।

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बैल की, बीजों की, हल की औ' कहानी खाद की,

सबसे बढ़कर इक कहानी, आदमी के स्वाद की,

लिख रहा जो पटकथा सबकी रसोई की, उसे

हो गई इतनी कमी क्यों —स्वयं से संवाद की?

इस कहानीकार का सम्मान होना चाहिए।

अन्नदाता का धरा पर मान होना चाहिए।

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है यही देवत्व उसका, अन्न का वह ईश है।

जब अदालत थालियों की हो, वो न्यायाधीश है।

बात आती है जहां इंसाफ़ की उसके लिए,

न्याय से फिर आंकड़ा उसका वही छत्तीस है।

इस मुकदमें पर भी सबका ध्यान होना चाहिए।

अन्नदाता का धरा पर मान होना चाहिए।

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जठर की अग्नि से उसका युद्ध जारी है अभी,

न्याय के आंगन में बाक़ी पैरोकारी है अभी,

श्रमिक है, वो पूज्य है, वो तात है, दाता भी है।

फिर भी क्यों मर्ज़ी बेचारे की बेचारी है अभी?

उसके हक में भी कभी मतदान होना चाहिए।

अन्नदाता का धरा पर मान होना चाहिए।

 

स्वरचित   अंजु 'अना'

जमशेदपुर, झारखंड 

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