मानी गई न बात मैया ,सती जी से आज
चलने चली है नैहर,ससुराल से आज।
बिन बुलाए चली गई ,यज्ञशाला में आज
शिव‌‌ ने मना किया मानी नहीं अर्धांगिनी।

चली गई वो पर लौट कर न आई,
देख इस अनर्थ को शिव जी न माने।
भेज अपना रूप (वीरभद्र) कर दिया सब नाश
लेके देह सती की घूमें इधर-उधर आज।

करने उद्धार तब श्री हरि(विष्णु)जी चले ,
चला के चक्र देह खंड-खंड कर दी।
हर अंग बनी एक नया ही शाक्तिपीठ,
बहुत रोती बिलखती है जग तब,
अर्धांग है शिव ,अर्धांगिनी है सती
अर्धांग है शिव ,अर्धांगिनी है पार्वती।
सावन की बधाई।