महक किताबों की अब कहाँ,अब तो मोबाइल की स्क्रीन चटकती है,
रील्स देखते-देखते रात के तीन बजे आँखें मटकती हैं!
वो भी दिन थे जब किताबों में चोरी-छिपे खत और गुलाब मिलते थे,
अब तो PDF खोलते ही फोन हैंग होने के नए-नए खिताब मिलते हैं
ये PDF है ऐसी जैसे किसी ढाबे का 'सस्ता मेन्यू कार्ड' हो,
और अपनी पुरानी किताबें थीं जैसे ससुरजी का दिया हुआ 'आशीर्वाद' हो
पहले लोग किताबों के पीछे मुँह छुपाकर शर्माते थे,
अब PDF के बहाने बैकग्राउंड में इंस्टाग्राम चलाते हैं
ये PDF तो बस आँखें दुखाने और चश्मा चढ़ाते।
