दबी सी रह गई वो काग़ज़ों के बीच अब तक चंद लफ्ज़ों के साथ रह रही थी आज अचानक वो रोज़नामचा खुला तो सूखी पत्तियां कुछ कह रही थी कह रही थी कि... कली ही तो थी,  खिली भी नहीं थी ताज़गी, वो मासूमियत भी नई थी तोडा गया मुझे खिलने से पहले फूल बनकर महकना, किस्मत नहीं थी