सुनो तुम घर परिवार को अच्छी तरहा सम्भालने लगी हूँ
चालीस की हो गई हूँ ना
प्रौढ़ मे आ गई हूँ
तुम भी तो मुझसे दो साल ही बड़े हो
उम्र का असर तुम पर भी है
पर ये मुई उम्र क्या छीनेगी तुमसे मुझसे
मै तो अभी भी खिलखिला जाती हूँ
ठीक उसी तरहा जैसे सोलह बरस मे खिलखिला जाती थी
और तुम भी तो नज़र की चोरी से उस नज़र को फिरा ही देते हो
ना हाँ बच्चे बड़े हो गये हैं
और हम और बड़े हो गये
फ़िर इस रिश्ते की भी तो उम्र बढ़ ही रही है
और पक्का और प्रगाढ़ हो रहा है
जिम्मेदारियों मे प्यार की छूअन की गुंजाइश रखना
कुछ मै सी दूँगी प्यार को
कुछ तुम सी देना
ये इश्क उम्र का बंधन नही मानता है
ये दिल का बंधन है
सुनो तो बस एक ही इच्छा है
सुहागन ही जाऊँगी तेरे काँधे पे
उस समय चाहे अस्सी की बुढिया हो जाऊँ
सोलह श्रंगार करना माँग मेरी भरना
और कान मे मेरे फ़िर एक बार अंतिम बार मुझे प्यार है
तुमसे ये ज़रूर कहना हाँ ज़रूर कहना अंजलि