देखता हूँ किस तरह,
आसमान लबालब भरा रहता है,
उड़ती हुई पतंगों से।
लड़ती, झगड़ती, कुढ़ती, खिसयाती,
लाल, पीली, नीली, गुलाबी
खरीद रखा हो सारा अम्बर जैसे
तीन रुपये की इस कागज़ की पतंग ने!
लेकिन सहम जाता हूँ,
अपनी कटी पतंग को देखकर,
जिसका धागा अभी भी उससे लिपट के सिसक रहा है।
जो घाव अम्बर ने दिए थे उसे,
वो अभी भी चुभते हैं
जब भी कोई उड़ने की बात करता है।
पतंगों को उड़ना ज़रूरी है क्या?
उसके पिता ने भी उसको उकसाया है?
क्या वो चुपचाप, बिना उड़े, बस यूँ ही,
मेरे क़रीब नहीं रह सकती?
हमेशा?
मैं अपनी कटी-पतंग में,
खोजने लगता हूँ खुद को
जो नहीं चाहता वो आसमान,
जिसपर हिस्सेदारी हो सबकी।
मुझे घर का वो एक कोना दे दो,
जिसमें कम से कम अपना धागा लिपटकर मुझसे
रो तो सकता है।
Photo by Charlotte Harrison


