वृक्ष मूक नहीं होते, उनकी होती है आवाज़,

 विरली-सी, सांकेतिक भाषा।

 वो ख़ुद कुछ नहीं बोलते लेकिन,

 घोंसलों में भरते हैं नन्हें पक्षी जब,

 विलय की किलकारियाँ,

 उनको रिझाने, वृक्ष बजाते हैं

 पत्तों का झुनझुना ;

 बारिश की बूँदें जब होती हैं उच्छृंखल,

 तो बजता है जल-तरंग ;

 और पत्ते गिरकर धरती पर,

 देते हैं तबले-सी ताल।

 गूँज उठती है एक पीड़ा जो कानों से नहीं,

 हृदयग्राही होती है।


 एक वृक्ष कटने पर एक वृक्ष नहीं,

 सहस्त्र प्रकृति गूँगी होती है!


Photo by : Jan Huber (Unsplash)