"तुम सब में बहादुर बच्चा कौन है?" जादूगर ओ.पी. शर्मा ने स्टेज पर खड़े हुए बच्चों की भीड़ से प्रश्न किया। नन्हे-मुन्ने महारथी तुरंत हाँथ ऊपर करने लगे। जादूगर ने दोनों तरफ एक सरसरी निगाह डाली और फिर पीछे वाली पंक्ति से एक बच्ची का हाँथ थाम लिया।

"आओ, बहादुर बच्ची! आगे आओ! बाकि सब बहादुर अपना स्थान ग्रहण करें।" खचाखच भरा ऑडिटोरियम तालियों से गूँज उठा। जनता ने सभी बच्चों का खूब उत्साह-वर्धन किया।

जादूगर ने बच्ची को स्टेज के बीच में लाकर खड़ा कर दिया और पूछा ― "बहादुर बच्ची का नाम क्या है?"

"जादूगर सौम्या" बच्ची ने निडरता से उत्तर दिया।

हँसी के ठहाकों से पूरा ऑडीटोरियम भर गया।

"जादूगर सौम्या? कुछ जादूगरी हमें भी सिखाइये!" जादूगर ने हँसते हुए कहा।

"जादूगर अपना राज़ किसी को नहीं बताता।" सौम्या ने चहकते हुए कहा। एक बार फिर, ऑडिटोरियम में तालियों की लहर दौड़ पड़ी।

जादूगर ने प्यार से सौम्या का गाल खींचा और कहा ―

"तो जादूगर सौम्या, अगले कुछ पलों के लिए सिर्फ वही करना है जो मैं तुम्हें बताऊँगा।" स्टेज के पीछे से एक लड़की ने आकर सौम्या के आँखों पर पट्टी बाँध दी। "भाइयों और बहनों! पलकें झपकना बंद कर दीजिये क्योंकि अगले ही पल मैं आपकी आँखों के सामने से सौम्या को गायब कर दूँगा"।

इतना कहकर जादूगर स्टेज के एक कोने में चले गए। स्टेज के बीच चुपचाप खड़ी सौम्या अत्यंत शांत व शालीन प्रतीत हो रही थी। सारी जनता एकटक स्टेज पर निगाहें गड़ाई हुई थी। सबने साँस लेना तक बंद कर दिया था।

जादूगर ने धीमे से सौम्या की तरफ दो कदम बढ़ाये और फिर बड़े ही नाटकीय अंदाज़ में अपने हाँथों को घुमाने लगे। जादूगर के हिलते हुए होंठ कुछ मंत्र बुदबुदा रहे थे कि तभी स्टेज के बीच में एक धुएँ का विस्फोट हुआ और सभी लोगों के आश्चर्य के लिए सौम्या का नामोनिशान तक स्टेज पर नहीं था!!

जनता हक्की-बक्की रह गयी। कई तो अपनी आँखें मल-मल के दोबारा उस खाली स्टेज को तकने लगे तो कई एकदम सुन्न पड़ गए। पर उन सब सुन्न पड़े व्यक्तियों में सबसे अधिक सदमे में एक ही व्यक्ति था ― स्वयं जादूगर ओ.पी. शर्मा।

क्योंकि जादूगर सौम्या, उनके जादू करने से पहले ही गायब हो गयी थी।