प्रथम गुरू माँ; होती है

भूख को समझती है

मैं नहीं जानती थी,

पीड़ा और रोना अपना

तभी तो प्रभु ने माँ के खून को ही

अमृत दूध बनाया

माँ, ही तो अमृत रस

मुख में डालती है

वो भाव, वो रस, साथ ही अंजाना सा डर

अंजाने में ही घोल जाती है,

गर्म हवाओं की आंधी से

सुखों की प्याली चटक न जाएं

दुआओं भरा हाथ सर पर रखती है

प्रथम गुरू माँ होती है....

- अनीता