सोचता हूँ

की ग़र पैसों की तरह होती धड़कने

तो संभाल कर ज़ेबों में रखते

ज़रुरत पड़ने पर ही ख़र्च करते

थोड़ी ज़्यादा जो हो जाती

तो अलमिरा में सहेज लेते

या किसी यार को

ख़ास मौक़े पे तोहफ़े में देते

या फिऱ

किसी अजनबी की मदद में ख़र्चते 

और जो अगर कम पड़ जातीं

तो किसी दोस्त से उधार ले लेते

या फिऱ पुराना कोई सामान बेच कर

इंतज़ाम कर लेते


अफ़सोस

की पैसों की तरह नहीं हैं धड़कने

अपने हिस्से की सबके पास

कितनी हैं पता नहीं

लेकिन अक़्सर

ज़रूरतों से कम हैं




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अनिरुद्ध