मुठ्ठी भर अंधेरा ,
मुठ्ठी भर रौशनी,
ये कैसा आलम है मौला,
जो चलता ही जा रहा है।
थोड़ी ओस कम होती लगती है,
थोड़ा कोहरा बिखरता दिखता है,
फिर ये कैसी मन्हुसी है मौला,
जो जिस्म से मेरे यूं चिपक जाती है।
हां, तुझे धोका दिया है मैंने,
तेरे दर से कई बार ,
बिना सजदे किए मुंह चुरा कर भगी हूं,
पर मौला, दिल का हाल तू नहीं समझेगा तो,
किसके आगे रुकु करने जाऊं मैं,
के दिल साफ है मेरा।
हां कुछ उलझ गई हूं अपने ही सवालों में,
जिनके जवाब में मसरूफ रहने लगी हूं।
तुझसे मुंह मोड़ने का इरादा नहीं है मौला,
बस, खुद से ही थोड़ी रूठी रहने लगी हूं।
तू खुद ही क्यूं नहीं
आज ठहर जाए,
शाम की चाय के साथ
बातें मेरे दिल की पढ़ जाए।
जो खुद को ही बेवजह उलझाया है मौला,
तुझसे मदद मांगने से शर्म आती है,
क्यूं ना आज तू
मुझ बदनसीब के हिस्से में भी थोड़ी नसीब लिख जाए।
मौला मैं थक गई हूं,
इन लोगों को बताते ,जताते,
की तकलीफ़ कम नहीं होती बात करने से,
की कोहरे साफ नहीं होते साथ चलने से,
तू तो खुदा है मौला,
आज तू ही बांट ले इस पागल की परेशानियां,
आज फिर अपने दर से भरी झोली विदा कर दे।
खुश है मेरा दिल,
की शायद इस स्याही की बनावट को तेरे फरिश्ते,
तेरे पास ले जाएंगे,
शायद आज, शायद कल,
तेरा पैग़ाम लाएंगे।
तू मेरी आखिरी उम्मीद है मौला,
तेरी ही दुनिया में हज़ार वजह है आज तेरी हकीकत ठुकराने के लिए,
मुझे आज तू एक और वजह ना दे देना!