ठंड निकाले जान ।
शीतल सन-सन हवा चल रही
थर्र - थर्र काँपे अंग,
सूरज नभ के बंदीगृह में
धूप सुने सत्संग।
जमने लगा बिहान
ठंड निकाले जान ।
आग जलाये बैठे हैं सब
घर, आँगन , खलिहान,
ठंड हवा संग है बलखाती
जब से हुई जवान।
बेपर करे उड़ान
ठंड निकाले जान।
अकड़े सारे वृद्ध झेलते
जीवन पर आघात,
बीते दिन गिन मुश्किल घड़ियाँ
पर्वत - सी हर रात।
बेकल हुआ जहान
ठंड निकाले जान।
विगत रात से दिशा-दिशा पर
कोहरे का है साया,
किस अम्बर से ढकने को जग
है अँधियारा आया!
छुप-से गये मकान
ठंड निकाले जान।
अनिल मिश्र प्रहरी।


