पाया , जिसने जो है बोया।
घृणा, क्लेश का बाग लगाकर
धवल शील पर दाग लगाकर ,
द्वेष पालकर नित्य ह्रदय में
जीता- मरता सदा अनय में।
देख तिक्त फल क्यों अब रोया?
पाया , जिसने जो है बोया।
संस्कार से वंचित पीढ़ी
गह्वर अतल पहुँचती सीढ़ी,
लोकलाज का मिटता पहरा
व्यसन जख्म देता अति गहरा।
सदियों का संचित धन खोया
पाया ,जिसने जो है बोया।
कदम किसी का जब भी बहका
घर, समाज है तब-तब दहका,
समय न आता लौट द्वार पर
रोता नर उसके प्रहार पर।
खोया वही, रहा जो सोया
पाया , जिसने जो है बोया।
अनिल मिश्र प्रहरी।


