कर वतन से प्यार।
द्रोह के तू पंथ मत चल
अनगिनत घर हैं गये जल,
खून के छींटे पड़े
दिखते अमन के द्वार।
कर वतन से प्यार।
साजिशों का जाल देखो
इस धरा का हाल देखो,
स्वर्ग की इन वादियों में
हैं बिछे अंगार।
कर वतन से प्यार।
चाहते अरि साधना हित
भावना इनकी नहीं सित,
कर रहे निष्ठुर यहाँ
नित मौत का व्यापार।
कर वतन से प्यार।
कूद मत है तेज धारा
छोड़ मत सरि का किनारा,
है कठिन उस पार होना
जो फँसा मँझधार ।
कर वतन से प्यार।
अनिल मिश्र प्रहरी।


