भारती! गाऊँ सुयश के गान। 


नव- प्रभा, नव-राग, नव- युग

का  करूँ  अभियान  मैं, 

कर सकूँ निःस्वार्थ, निज कर

राष्ट्र  का   निर्माण  मैं। 

भक्ति - श्रद्धा के सुमन को

चाहता  दर  पर  चढ़ाना, 

इस धरा पर  ले  जनम

मैं चाहता हर बार आना। 

  और जाऊँ दे तुझी को  प्राण। 

  भारती! गाऊँ सुयश के गान। 


स्वर्ग का सुख गोद तेरी 

प्यार  है  अंतर   भरा, 

तू विभा, वैभव विभासित 

सुख सकल, सुन्दर - धरा। 

शान्त, शीतल, सित निशा में 

देवगण  तुझको  निरखते, 

चाहते कि स्वर्ग में  एक

भारती    इंद्रेश    रचते। 

       स्वर्ग भी झुकता तेरे दर आन। 

       भारती! गाऊँ सुयश के गान। 


युग - युगों से प्यार की 

गंगा - जमुन बहती यहाँ, 

बाँटने वाली  नहीं  दीवार 

टिक    सकती    यहाँ। 

मुस्लिमों की बस्तियों में 

हाँ,  यहाँ  बनते  शिवाले, 

भेद दिल के,  वैर, कटुता 

के  घरौंदे   तोड़  डाले। 

    नफरतों का है न कोई भान। 

   भारती! गाऊँ सुयश के गान।  


अनिल मिश्र प्रहरी।