सिर पे आसमां कम पड़ जाए
सूनी राहों में हम भटक जाएं
या समय के आगोश में बहक जाएं
जब इंसान खुद से ही थक जाए
तब क्या करे
अपनी ही बुलंदियां सताने लगे
हर कोई दुश्मन नजर आने लगे
अकेलापन हर पल खाने लगे
मां की लोरियां याद आने लगे
तब इंसान क्या करे
सितारे गर्दिश में हो
ग़म के बंदिश में हो
सभी नजरअंदाज करने लगे
व्यापारी सा व्यवहार करने लगे
तब इंसान क्या करे
सच्चे साथी को पहचान लें
ज़माने से थोड़ा विराम लें
सजा लें मेज़ अच्छे किताबों से
ज्ञान के शाश्वत आफताबों से
चलो दोस्त !
किताबों से दोस्ती कर लें।


