विज्ञान डर रहा हैं, 

वो विज्ञान जिसने, 

इंसान को बचाने के लिए, 

ना जाने कितने ही धरती के नस्ल को, 

मिला दिया मिट्टी मे, 

और खोद कर उनकी कब्रें, 

पता करना चाहता है उनके मौत का रहस्य, 

वो विज्ञान डर रहा हैं जिसने, 

कुदरत के, 

हर जानवर के घर में, 

घुस कर कितने प्रयोग किए, 

या उन्हें मार डाला, 

या बदल दिए कई नस्ल उनके ।


लोग डरे हुए हैं, 

डर एक विषाणु से, 

डर लग रहा हैं, 

उन तरक्की पसंद लोगों को, 

जो कहते थे, 

विज्ञान से देखना मौत को भी जीत लेंगे, 

जो कहते थे कि, 

मंगल और चांद पर, 

वैज्ञानिक वातावरण बना कर, 

इस लोक से उस लोक तक, 

शोर मचा देंगे कि, 

हमने दूसरी धरती बना ली हैं। 


डर रही हैं, 

दुनिया की वो सबसे बड़ी वैज्ञानिक शक्ति, 

जो दुनिया को शून्य करने का दम रखती थीं, 

शून्य अपने नाभिकीय ऊर्जा से, 

डर रहे हैं वो सभी विकसित देश, 

जो तरक्की के नशे में चूर होकर, 

नष्ट कर दिए कई प्रजातियों को, 

और बदल दिया कई जंगलों को, 

बड़े बड़े इमारतों मे, 

और शक्तिशाली प्रयोगशालाओं में, 

और दाग दिए कई गोले समुन्दर की गहराई मे। 


डर रहा हूं मैं भी, 

चेहरे पर कपड़े का टुकड़ा देख, 

डर लग रहा हैं मुझे भी, 

उन टुकड़ों के पीछे का डर देख, 

डर जो मैंने नहीं देखा, 

मेरे इस देश मे, 

कभी उस चुड़ैल से भी, 

जो पाई जाती हैं, 

गाव के कुआ मे, 

एक अफवाह के बाद।