किस तरह कहूं तुम्हे मैं अपने मन की व्यथा।
हो अपने में ही मग्न कहीं तुम,
इठलाए बड़े मगरूर कहीं तुम।
में लेकर विचार अपने में अथा,
किस तरह कहूं तुम्हे मैं अपने मन की व्यथा।
जो बताने कुछ में पास तुम्हारे आया हूं,
राग तुम्हारी ही सुनकर हर बार निराशा में ढाया हूं।
इस तरह कभी पूरी ना हो सकी तुम्हारी ही कथा,
किस तरह कहूं तुम्हे मैं अपने मन की व्यथा।
जो समर कर रहे यह मेरे मस्तिष्क, मन,
है घबराया सा यह निष्पक्ष तन।
बड़ी गंभीर अवस्था है; जटिल तथा,
किस तरह कहूं तुम्हे मैं अपने मन की व्यथा।
है कपाल पर भविष्य की चिंता सदा,
कर रहे विचार अपना फर्ज अदा।
बड़ी कठोर हैं यह अचल प्रथा,
किस तरह कहूं तुम्हे मैं अपने मन की व्यथा।
जो दुख है मेरे जी के अंदर बसा,
अब इन आंखों के समंदर में रुक ना सका।
वो बहकर कतरों में है अथा,
किस तरह कहूं तुम्हे मैं अपने मन की व्यथा।


