हवाओ के साथ गुज़रता रहा, कभी चुप सा रहा... कभी बना क़हक़हा; ढूंढता था वज़ूद पहले... अब भी ढूंढता हूँ; सब्र को तोड़कर बस चलता रहा। न जाना कभी....न समझा कभी.... बस हर महफ़िल से गुजरता रहा। किसी ने न थामा... किसी ने न देखा... बस यूं ही बनकर के "तिनका" में उड़ता रहा।। नही फिक्र कोई रही मुझको कभी... नउम्मीदो को किस्मत बनाता रहा। बस चलते जाऊं यही वज़ूद है मेरा... मैं था एक "तिनका" बस "तिनका-तिनका" रहा।। -अनीस...