देखे थे जिसके सपने इन लरज़ती सी आंखों ने, फैलाये थे पंख दिल-ए-पंछी ने जिसके लिए कभी, पथरा गई निगाहें, खो गए रस्ते, उड़ गए ख़्वाब उड़ान की नुमाइश के, बैठे रह गए दिल-ए-पंछी सभी; सोचते रहे जिसको वो मुड़ा ही नहीं, मुड़ते गए वक़्त के साथ उसके कूँचे के रास्ते सभी; पूछा भी न मैंने, बस इज़हार ही किया नज़रो ने, लेकिन बेसबब हुए अंदाज़ दिल-ए-नादान सभी; खो गया रास्तों में, खो गई मंज़िल फिर, जवाब न मिला, न मिले वो कभी; दर्ज हुआ बस यही सवाल इस उम्र का, लम्हो की चादर लेकर, आखिर अब "जाऊं किधर"।।