= ग़ज़ल =

2122 1212 22


उसकी हर इक अदा अनोखी थी

रुख़ पे ज़ुल्फ़ें गिरा के सोती थी


आप से तुम में आ गये थे हम

गुफ़्तगू  इस तरह से होती थी


अश्क़ गिरते थें मेरि आँखों से

याद जब हम को कर के रोती थी


अक्स महसूस करके वो अक्सर

अपने तकिये को चूम लेती थी


आप से हम ख़फा नहीं थे कल

मेरि  आवाज़  थोडी  मोटी थी



आम लड़की नहीं थी मेरे लिये

मेरि खुशियों कि वो तिजोरी थी


अनीस बेकस