एक दशक पहले
मेरे दिमाग और
दिल में तलाक हो गया
इस बात पर
कि मेरे बर्बाद होने के लिए
कौन था दोषी
अंततः वे दोनों
फिर रह ही नहीं सके
एक ही कमरे में
एक-दूजे के साथ
अब मेरा दिमाग और दिल
दोनों मुझे बारी-बारी से
साझा करते हैं
हफ्तेभर मैं अपने दिमाग के साथ रहता हूँ
और मेरा दिल
मुझे सप्ताहांत पर मिलने आता है
वे कभी एक दूसरे से बात नहीं करते
दोनों बस मुझे दे देते हैं
एक छोटी सी वही पुरानी चिट्ठी
वही खत
जिसमें लिख देते हैं
एक-दूसरे के लिए
“यह तुम्हारा ही दोष है”
रविवार को
मेरा दिल शिकायत करता है
कैसे दिमाग में बीते समय में
हमेशा मुझे नीचा दिखाया है
और बुधवार को
मेरा दिमाग याद दिलाता है
उस ज़माने की
जब मेरा दिल भटक गया
और मेरा आने वाला कल
बर्बाद कर गया
वे दोनों दोष देते हैं
एक-दूसरे को
कि मैं क्या से क्या हो गया
बहुत कुछ हो चुका है
चीखना, चिल्लाना और रोना
इसलिए,
हाल ही में मैंने सारा समय अपने उदर में छुप कर बिताया
मेरी ही तरह मेरा अपना चिकित्सक है वो
ज्यादातर रातों को, अब मैं चुपके से
अपनी पसलियों में जकड़ी खिड़की
से निकल कर
बाहर भाग जाता हूँ
और मेरी रीढ़ से टिक कर
बैठ जाता हूँ
और बैठा ही रहता हूँ
बैठा ही रहता हूँ
तब तक जब तक सूरज न उग जाए
कल शाम,
मेरे उदर ने पूछा
कि क्या मैं परेशां हूँ
मेरे दिल और दिमाग के बीच
पिसाते हुए, पल पल
मैंने हौले से अपना सिर हिलाया
मैंने कहा मुझे नहीं पता
अगर मैं साथ रह सकता हूँ उनके
मेरा दिल हमेशा दुखी रहता है
कि कल क्या हुआ था
मेरा दिमाग
आने वाले कल के लिए चिंतित है
मेरी अंतर्मन ने
मेरा कस कर हाथ थाम लिया
कहा मैंने
मैं बस अब और साथ नहीं रह सकता इनके
अतीत की मेरी गलतियों की ग्लानी
या भविष्य के बारे में मेरी चिंता संग
मैंने आह भरी
मेरा अंतर्मन मुस्कुराया
बोला
तुम जाओ
अपने फेफड़ों के साथ रहो
जाओ अपने साथ रहो
मैं उलझन में था
वह बोला
यदि तुम तुम्हारे दिल की पुरानी यादों की दीवानगी
आपके दिमाग की भविष्य की परेशानी से परेशां हो
तो फेफड़े सही जगह हैं
उनमें कोई बीता कल नहीं है
आने वाला कल भी नहीं है
अभी है, आज है
केवल श्वास है
केवल साँस लेना है
छोड़ना है
फिर लेना है
फिर छोड़ना है
और उस सांस में
सुकून खोज सकते हो
तब तक
जब तक दिल और दिमाग
सुलह कर लें
आज सुबह,
जब मेरा दिमाग
चाय की पत्तियां पढ़ रहा था
और दिल मेरा
घूर रहा था
पुरानी तस्वीरों को
मैंने अपना सामान समेटा
और चला गया
मेरे फेफड़ों
के द्वार तक
इससे पहले कि मैं दस्तक दे पाता
उसने दरवाजा खोला
एक हलकी मुस्कान के साथ
एक हवा के झोंके से
मुझे गले लगा लिया
और कहा
‘तुमने इतना समय क्यों लगा दिया?’
-अनुवादित.
Original by John Roedel.

