अपनी नन्हीं खुशियां मैं ‬

और मैं ही अपने हज़ारों ग़म

थोड़ा-बहुत ज़्यादा भी मैं

मैं कभी थोड़ा सा कम

ख़ुद के लिए

ख़ुद ही अब

काफ़ी हूं मैं।


कोई अधूरी ख़्वाहिश सी मैं

या कोई सपना पूरा

मैं ही मेरा पराया

मैं ही मेरा अपना

ख़ुद के लिए

ख़ुद ही अब

काफ़ी हूं मैं।


भीगी सी आंखें भी मैं

और मद्धम सी हंसी भी

बेइंतहां नफ़रत सा मैं

सैलाब सी दिलकशी भी

ख़ुद के लिए

ख़ुद ही अब

काफ़ी हूं मैं।


दिल से निकली दुआ मैं

या पूनम की रात की इबादत

छलनी करता ज़ख़्म भी मैं

और मैं ही राहत

ख़ुद के लिए

ख़ुद ही अब

काफ़ी हूं मैं।


भयावह भीड़ भी मैं ही

और मैं ही मेरी तन्हाई

सुकून मेरा मुझसे ही

ख़ुद से ही रुसवाई

ख़ुद के लिए

ख़ुद ही अब

काफ़ी हूं मैं।


मेरा धधकता सूरज भी मैं

निशा में मैं ही चांद मेरा

ख़ुद का मैं ख़ज़ाना

ख़ुद ही अपना पहरा

ख़ुद के लिए

ख़ुद ही अब

काफ़ी हूं मैं।


मेरी उम्मीद भी बस मुझसे

मैं ही मेरा अरमान

मैं ही अब मेरी लज्जा

मैं ही मेरा अभिमान

ख़ुद के लिए

ख़ुद ही अब

काफ़ी हूं मैं।


मेरी हर अल्हड़ ज़िद मुझसे,

और बावला इश्क़ भी

मेरी ही मुझसे ईर्ष्या

ख़ुद से मेरा रश्क़ भी

मेरी हर सुबह सिर्फ़ मुझसे

हर शाम बस मेरे नाम

मैं ही मेरी मदहोशी

बस इक मैं ही मेरा ज़ाम

मेरी मौत का जश्न सिर्फ़ मेरा

मेरी रूमानी ज़िंदगी मेरा ईमान

ख़ुद के लिए

ख़ुद ही अब

काफ़ी हूं मैं।