घर में एक औरत की कमी तब अखरती है

जब वो चली जाती है

और वापस लौट कर नहीं आती

और फिर छत पर लगे जाले व आँगन की धूल

हटाने में संकोच आता है

"तुम और तुम्हारी ये दो कौड़ी की सफाई"

कहने का मौका नहीं मिल पाता।

कमी तब अखरती है

जब कॉलर का मैल छुटाने में

पसीना छूट जाता है

कपड़े धोते समय चूड़ियाँ साथ में नहीं खनकती

और तब उसके हाथों का "मेहनतकश" होना याद आता है

और "तुम कमज़ोर हो" ताना नहीं दे पाते।

कमी तब भी अखरती है

जब घर में देर से आने पर

रोटियां ठंडी हो जाती है

सब्जियों में पसंद का जायका नहीं रहता

और यह कहते नहीं बनता

कि "मुझे ये पसंद नहीं "।

कमी तब अखरती है

जब बच्चा रात को ज़ोर से रोता है

फिर अनमने से उठ जाते हो

बच्चे को सुला नहीं पाते

और यह नहीं कह पाते

"कितनी लापरवाह हो तुम"।

कमी तब अखरती है

जब आप रात में अकेले सोते हैं

करवट बदलते रहते हैं

बगल में लेकिन हाथ धरने पर

कुछ नहीं मिलता।

कमी तब अखरती है

जब त्यौहारों के मौसम में

नयी चीज़ों के लिए कोई नहीं लड़ता

कोई तोहफे नहीं माँगता

और तुमसे ये कहते नहीं बनता

कि " फालतू खर्च के लिए और पैसे नहीं हैं "।

कमी तब अखरती है

जब आप गम के बोझ तले दबे होते हैं ,

निपट अकेले रोते हैं

और आपके आंसू पोंछने वाला कोई नहीं होता

आप किसी से कुछ नहीं कह पाते

हाथ नहीं उठा पाते, आवाज़ नहीं दबा पाते

कसमसाकर, खीज कर, चिढ कर, मन मसोस कर

खुद ही झींकते हो,

और दोषारोपण नहीं कर पाते

कि "तुम होती तो ऐसा होता ही नहीं ।"



- अज्ञात