उसकी अदालत में…
मेरे ख्यालों पे कुछ इस क़दर हुई जिरह उसकी अदालत में…
के सारी दफाए धरी के धरी रह गई मेरी वकालत में…
वो एक एक कर ज़ुल्म ढाते रहे कनखियों से दीदार कर के…
हमने जान गवां दी अपनी ही सराफत में…
हमें नया नया हुआ रहा इल्म इश्क़ के दर्द का…
उन्हें मुहब्बत की पूरी क़िताब मिली है विरासत में…
हमनें खता ही क्या की थी हमें पता भी ना चला…
फांसी से उम्रकैद तक आ पहुंची सज़ा वो भी रियायत में…
वो इश्तहार दे दे के थकते नहीं हैं अख़बार में एक घर ढूंढने को…
कोई बताए उन्हें के एक कमरा खाली है हमारी चार मंज़िली इमारत में….
इश्क़ है तो खुल के इजहार कर ना…
क्या रक्खा है इंकार के दिखावट में…
मेरे ख्यालों पे कुछ इस क़दर हुई जिरह उसकी अदालत में…
के सारी दफाए धरी के धरी रह गई मेरी वकालत में…
© आनंद


