कुछ हलचल सी है कुटुंब में, दुखते से हाथों में कालिख के जैसे; कुछ चाबुक को फटकाते मालिक के जैसे;

कुछ कचहरी के गेटों पर नालिश के जैसे, आग में तपी आंखों में आज आग कैसे उतर आई? क्यों बे चूज़े तेरी दहाड़ कैसे निकल आई?

जो कोयले की खानों में घुटनों तक धँसता, तपने से डरता पर हीरे पर हंसता, बूंदें भी रिसती हैं काली सुराखों में इसको डुबोयेंगी पानी के जैसे और शोले बरसाएंगी जा़लिम के जैसे;

जब मालिक हम होंगे तो मालिक क्या होंगे, रंगदारी की रिश्वत के वारिस क्या होंगे, आंखें फिर खुलती तो झड़ जाता सपना मुट्ठी से बारूदी पाउडर के जैसे;

जब चाबुक से चमड़ी पर छाले पड़ आए और लाशों के मलबों पर जाले पड़ आए तो तीली से जलकर हम काबिज़ हुए और गायब इस सूबे के वारिस हुए; हम घुलते हैं पाउडर में माचिस के जैसे और जलते हैं दिल टूटे आशिक के जैसे।