राही मंजिल बिन रुका नहीं।
पथ पर बाधाओं को देखा
उसने हँसकर उनको लेखा
रहबर था कोई मिला नहीं
लेकिन उसको कुछ गिला नहीं
मतवाला था मय के रंग में
सोता था कर्मों के संग में
तन्द्रा से था भर चुका नहीं
राही मंजिल बिन रुका नहीं ।।
मौसम ने लाखों वार किये
पथ पर उसकी दीवार किये
जग ने उसको बेकार कहा
पागल सनकी सौ बार कहा
मंजिल ने माना सौतेला
उसने हँसकर यह भी झेला
इतने पर भी वह झुका नहीं
राही मंजिल बिन रुका नहीं।।
लेकर नौका साहिल तट पर
पंहुचा मंजिल की चौखट पर
असफलताएं फिर रमीं कहाँ
उसने छोड़ा कुछ कमी कहाँ
तूफानों से टकराकर के
अपनी मंजिल को पा कर के
ना जग को होने दिया सही
राही मंजिल बिन रुका नहीं ।।
सारा जग उसको पूज उठा
नभ जयकारों से गूँज उठा
जग ने उसका सब कुछ छीना
अब सीखा उससे ही जीना
उसको पत्थर से खुदा किया
साधारण नर से जुदा किया
असमंजस में था वह जैसे
आ गया धरा पर और कहीं
राही मंजिल बिन रुका नहीं ।।