क्षण ने कैसा आज तराशा !!   ---- कवि आनंद

-------------------------------------------

युग बीता; क्षण बीते-बदले, हुए समय के कितने रागी !

कितनी लहरें टकराकर के, आज तटों से वापस भागीं !!

कभी नीर के अभिमानी ये, कितनी नदियां-सागर सूखे !

कभी क्षुधा पर हँसने वाले, दानवीर भी होकर भूखे !!

बैठे है देखो अब लेकर, मन में कितनी ये अभिलाषा !

क्षण ने कैसा आज तराशा !!

अलि पर हँसने वाली कितनी, सूखी ये कलियाँ मुरझाकर !

आज धरा पर उतरे कितने, सदियों तक जलधर इतराकर !!

सदियों से तम हरने वाले, बुझे सहस्त्रों दीपक जलकर !

कितने ही चमके अम्बर में, रवि-नक्षत्र यूँ ही ढल-ढल कर !!

आशाओं की किरणों में भी, छिपी हुई है आज निराशा !

क्षण ने कैसा आज तराशा !!

थल पर विप्लव लाने वाली, कुंद पड़ी तूफानी लहरें !

चीर चुके उर सागर के जो, डरकर तट पर बेड़े ठहरे !!

ख़ामोशी यूँ सहने वाले, बोल उठे वीराने बंजर !

काटे कितने मस्तक जिसने, डरे लहू से निर्मम खंजर !!

कितने पंडित-ज्ञानी लेकर, आज खड़े अपनी जिज्ञासा !

क्षण ने कैसा आज तराशा !!

   ------- कवि आनंद