आज धरा फिर काँप उठेगी, परिवर्तन भूचालों से !
आज बनेगा नया हिमालय, हर एक नए सवालों से !!
हर द्रोही को आज क्रांति की, इस ज्वाला में जलना होगा !
आज क्रोध को पलना होगा !!
पुनः बना लो नव काराएं, सत्ता पर जो काबिज हैं !
अब धधकेंगी क्रांतिदूत की, ज्वालायें फिर हरगिज हैं !!
बैशाखी को आज छोड़कर, निज पांवों पर चलना होगा !
आज क्रोध को पलना होगा !!
सूरज से नव स्वर्णिम किरणें, फिर से आज चमकना होगा !
गद्दारों के गहन बवंडर, को अब आज दुबकना होगा !!
मंद हुए हर एक सूरज की, ज्वालाओं को फलना होगा !
आज क्रोध को पलना होगा !!
बदलेगी हांथों की रेखा, आज नए पैमाने में !
फिर जन्मेंगे गांधी-नेहरू, भगत सिंह वीराने में !!
पाषाणों से आज भाग्य की, रेखाओं को ढलना होगा !
आज क्रोध को पलना होगा !!
बहुत हुआ युग परिवर्तन का, इन आँखों में स्वप्न संजोना !
बहुत हुआ गैरों के आगे, अपने हक़ की खातिर रोना !!
आज इरादों की गर्मी से, उर पाषाण पिघलना होगा !
आज क्रोध को पलना होगा !!
दुर्वाशा की पर्ण कुटी को, हीन निशाचर होना होगा !
आज धरा पर जगह बीज के, बंदूकों को बोना होगा !!
छिपे हुए हर गद्दारों से, अब तो आज संभलना होगा !
आज क्रोध को पलना होगा !!
आज खून के हर कतरे में, फिर उमंग की ज्वाला होगी !
आज कर्म की तलवारें या, फिर हांथों में हाला होगी !!
मधुशाला में घूंट कर्म का, पीकर आज मचलना होगा !
आज क्रोध को पलना होगा !!
जन्मेजय के सर्पयज्ञ की, आहुतियों-मन्त्रों के बल पर !
तक्षक को जलना ही होगा, इंद्रासन के भी हलचल पर !!
डसने वाले हर सर्पों के, फन को आज कुचलना होगा !
आज क्रोध को पलना होगा !!
अपने इन कोरे जज्बातों, से जिसने अब तक खेला है !
जिनके भीषण मायाजालों, से हमने हर दुःख झेला है !!
इंद्रजाल फ़ैलाने वाले, आज इंद्र को छलना होगा !
आज क्रोध को पलना होगा !!