जंगल के बीच ,
इक पेड के नीचे ,
छाँव में ,
बैठकर ,
एक सूखी रोटी का निवाला ,
मुँह में डालकर ,
वो देख रहा था ,
अपनी बकरियों को चरते ,
जो पूरे पहाड़में टिमटिमा सी रह थी ,
पूरी दुनिया से बेखबर वो ,
पुराने से रेडियो में ,
विविध भारती का ,
दोपहर का फरमाइशी कार्यक्रम ,
सुन रहा था ,
और बाकी दुनिया ,
कोरोना के डर ,
से दुबकी पड़ीथी ,
अपनी चारदीवारी के अंदर ,
बाहर जाने से कतरा रही थी ,
और वो मस्त मलंग ,
अपनी दुनिया में ,
अलमस्त ,
रेडियो पर उस वीराने में ,
" ज़िन्दगीएक सफर है सुहाना ,
यहाँ कल क्या हो , किसने जाना ?"
सुन रहा था।
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