जब अंजाम तुम्हे पता था तो शुरुआत ही क्यों की थी
दोस्ती अच्छी भली थी प्यार की बात ही क्यों की थी
मेरे लाख मना करने पर भी तुम एक नहीं माने थे
क्योंकि तुमको शायद अस्थायी विकल्प जो बनाने थे
विकल्प था मैं पर अनिवार्य का दिखावा शानदार था
था प्यार नहीं मगर प्यार का अभिनय भी जानदार था
अभिनय इतना शानदार था कि मैं भी धोखा खाया था
अभिनय और असलियत में फर्क समझ नहीं आया था
जब तक असलियत समझ पाते बहुत देर हो चुका था
विकल्प बन अपना वजूद और अहमियत खो चुका था
बिन सोचे सब छोड़े जब बस भरोसा तुमपे जताया था
तुमने जाने किसको अपना अंतिम विकल्प बनाया था
इस बहु विकल्प के खेल में मेरी हुई करारी हार थी
हर जंग अकेला लड़ रहा था जब तुम मेरी संसार थी
चलो जो हुआ अच्छा हुआ तुमने सब कुछ पा लिया
मैंने भी तन्हाई को जीवन भर के लिए अपना लिया
बस कुछ बातों का पछतावा जीवन भर मुझे सताएगा
बहुत से "क्यों" का जवाब मुझे कभी नहीं मिल पायेगा
~आनन्द
