जय जवान


दूर अपने गांवों में

ये सपने छोड़ आता है

भारत माता का ये सपूत

भारत का मान बढ़ाता है


देह गला दे जो हिमालय

वहां धूनी रमाता है

आंधी, तूफान, गर्मी ,बरसात

रोक इसे कहां पाता है


आंख दिखाएं दुश्मन जो

उसके छक्के छुड़ाता है..

राहत हो या भूकंप

सामने नजर आता है


बात आए आन की

तिरंगे की शान की

पीठ नहीं दिखाता है

ये जान से खेल जाता है...



रचयिता:: आनंद गोलछा