तुम्हारा मुझे बंधनों में बाँधने का प्रयास
लगता है जैसे बालक पकड़ लेना चाहे कोई तितली अनायास...
रह जाते हैं जिस तरह पांख के रंग हथेलियों पर
जो आजाद होकर भी बता जाते हैं कैद का एहसास...
ठीक वैसे ही ये रंगीले स्वप्न मुझसे जुदा होके बेशक़ रह जाएंगे तुम्हारी मुट्ठी की कैद में,
पर मुझे पाकर भी रह जाएगी तुम्हें मेरी ही तलाश...
मैं अपना तो लूंगी ही तुम्हारे बन्धन
पर खो दोगे तुम मेरा उड़ने का उल्लास...
नहीं मांगती मैं तुमसे सारा संसार, अपने पंख खोलने को चाहिए बस जरा-सा आकाश...
मस्त उड़ सकूँ मैं नील गगन में, भर सकूँ नये रँग पंखों में
फूलों संग बातें करूंगी, जुड़ी मैं हरदम तुमसे रहूँगी
बस खयाल करना इतना ही...
प्रेम तुम्हारा ना देने लगे मुझे काँटो-सा आभास
ना लगने लगे तुम्हारे बाहों के घेरे कोई पाश..
वही तितली हूँ मैं तुम्हारे बाग की
रखना हमेशा ही अपने आसपास, पर
मत करना कभी मुझे बाँधने का प्रयास...
-अनामिका 'अनु'


