इन पत्थरों की दीवार के बीच
सालों से बंद
शाखाओं लताओं से घिरी
एक रहस्यमयी सी
बंद खिड़की
अनेकों कहानियां बयाँ
करती है
बेरंगी सी दीवार पर
सिर्फ खिड़की की चौखट पर
लाल रंग क्यों
क्या किसी खतरे का एहसास था
या नई दुल्हन की तरह सजाया था कभी
क्या कभी ये खुलती भी थी
क्या यहाँ खड़े रह किसी ने
निहारा होगा कुदरत को
आसमान के रंगों को
बादलों संग आंख मिचौली खेलते चाँद को
क्या कभी यहां खड़े हो किसी ने
किया होगा किसी का इंतज़ार
या गाये होंगे विरह के या
मिलन के गीत
या इस खिड़की से आती महक से
पता चल जाता होगा कि
आज क्या पकवान बने हैं इस घर मे…...ं
पर मैं सालों से इसे बंद ही देख रही हूँ
कोई परिंदा तो क्या आता जाता होगा
हवा तक वहाँ मुश्किल से आती होगी
क्या यहां से किसी ने कूद कर
खत्म कर दी होगी अपनी हस्ती
क्या अंदर एक सूनापन पसरा होगा
कहते हैं कि दीवारों के भी कान होते हैं
क्या अंदर सन्नाटा पसरा होगा या
खामोशी गूंज रही होगी।
कहीं ये किसी भयानक से तिलसम
का रास्ता तो न होगा…..
अक्सर यहाँ से गुजरते हुए
मेरी नज़र इस खिड़की पर पड़ ही जाती है
और मैं ढूंढने लगती हूँ
अपनी ही पहेलियों के जवाब
ये पत्थरों की दीवार के बीच
बंद पड़ी एक रहस्यमयी सी
खिड़की………
अमिता गुप्ता मगोत्रा
स्वरचित