मैं तो बहता इक दरिया हूँ।
गर ठहरूँ, ठहरूँ तो कैसे।
साथ मेरे ये आसमान है।
रुकना है पर रुकूँ तो कैसे।
मैं ही साथी मैं ही मंज़िल
मैं ही हल हुँ,मैं ही मुश्किल
मैं अमृत हुँ, और हलाहल
मैं ही विपदा मैं ही संबल।
मैं सृष्टि का करता धरता।
मैं ही पलपल जीता मरता।
मैंने सतयुग द्वापर देखे।
श्री राम मुरलीधर देखे।
मैं ही सत्य हूँ मैं ही धोखा।
मैं कलयुग का लेखा जोखा।
मैं जीवन का महासमर हूँ।
युगों युगों से अजर अमर हूँ।
मैं ही मात हुँ, मैं विजय हूँ।
मैं समय हुँ, मैं समय हूँ।