सुना है मैंने लोगों से कभी मरती नहीं है रूह

किसी तलवार से, औज़ार से कटती नहीं है रूह

जलाने से किसी भी जिस्म को जलती नहीं है रूह

एक ऐसी शय है कि जिसको कभी हम छू नहीं सकते

एक ऐसा दृश्य जो हम लोगों की आंखों से ओझल है


अगर ऐसा है तो इसपर मेरा अपना तज़ुर्बा है

मुझे लगता है जितनी रूह हैं दुनिया में, श्रापित हैं

वज़ूद अपना बचाने के लिये ये जिस्म चुनतीं हैं

और अपने श्राप को इक जिस्म पर ये थोप देती हैं

बेचारा जिस्म लोगों से शिक़ायत करता रहता है

मगर सब रूह के पाबंद हैं तो कुछ नही सुनते


मेरे इस जिस्म की भी रूह से बिल्कुल नहीं बनती

मेरा ये जिस्म भी मुझसे शिक़ायत करता रहता है

सभी के जैसे मैं भी जिस्म की बिल्कुल नहीं सुनता

मगर मैं जिस्म पर थोपा गया ये दुख समझता हूँ

मैं जिस्म-ओ-रूह के झगड़े के बीचों बीच रहता हूँ।