नफ़रतों का बाकायदा बाज़ार देखा है
रोज़ ख़ून से सराबोर अख़बार देखा है।
और एक शाम को कुछ खेलते बच्चे दिखे मगर।
कुछ मासूमों के हाथ मे हथियार देखा है।
और ये मज़हबी बहस तिज़ारत का हिस्सा है।
हमने आँखों से लाशों का कारोबार देखा है।
और कोई इम्कान नही दिखता हमारे ठीक होने का।
मैंने अपनी भी जेहनियत को बीमार देखा है।
वो कहता है कि सबको एक एक चाँद दे देगा।
ख़ैर, ये मंज़र भी हमने कई बार देखा है